
"दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे". चौदह साल हो गए यह फिल्म देखे हुए. उन दिनों ग्रेजुएशन में था. फिल्म का खूब हल्ला हुआ तो सपरिवार एक बार देख आये. दूसरी बार देखना तब हुआ जब अपने एक दोस्त की जानपहचान के कारण भोपाल के ज्योति सिनेमा में फोकट में एंट्री मिल गयी.
अब इतने साल बाद सबको इसपर पोस्ट ठोंकते देखकर मेरी भी इच्छा होने लगी इसपर कुछ लिखने की. इन दिनों इसपर इतना ज्यादा पढ़ा देखा कि लगने लगा जैसे यह फिल्म भारत के ही नहीं बल्कि विश्व सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर है और गुप्त काल से लेकर बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक इतनी अच्छी फिल्म नहीं बनी.
चौदह साल पहले फिल्म देखी थी इसलिए इसकी कहानी कुछ भूल सा गया हूँ. इस पोस्ट के बहाने इसकी अद्वितीय कहानी को याद करने की कोशिश भी कर लूँगा और मुझपर इस फिल्म के प्रभाव की चर्चा भी हो जायेगी.
तो फिल्म शुरू होती है लन्दन में जहाँ छिछोराई का स्वभाव लिए पिता अनुपम खेर और उनका लाड़ला शाहरुख़ बहुत खुश हैं कि बाप इंडिया में फेल हुआ था तो बेटे ने लन्दन में फेल होकर खानदान की नाक ऊंची रख ली है. जान छिड़कते हैं बाप-बेटा एक-दूसरे पर.
दूसरी ओर लन्दन में रहकर भी भारतीय सुसंस्कृत जीवनशैली को अपनाए रखी है हमारी नायिका काजोल. अमरीश पूरी अपनी दूकान से पत्थर सा चेहरा लिए लौटते हैं तो यह देखकर संतोष करते हैं कि घर में चालीस के दशक के गाने बज रहे हैं, पॉप म्यूजिक नहीं. उन्हें पता नहीं कि लड़कियां दो मिनट पहले ही रॉक एंड रोल कर रही थीं.
अब काजोल (सिमरन) और शाहरुख़ (राज) दुनिया देखने निकल पड़े हैं. इससे पहले एक लफंगई की घटना में भोला-भला राज बियर खरीदने के चक्कर में अमरीश पूरी को नाराज़ कर बैठता है. बेचारा.
हिन्दुस्तानी फिल्म है तो नायक-नायिका मिलेंगे, लडेंगे, और अंततः प्यार करने लगेंगे. कई प्रसंग आते हैं जब राज अनजाने ही सिमरन के अंतर्वस्त्रों को छेड़ बैठता है, वैसे वह बहुत मासूम है. तभी तो नायिका उससे प्यार करेगी!
यूरोप में बेचारे नायक-नायिका हलकान हुए जा रहे हैं. राज सिमरन को बहुत समझाता है कि बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती है लेकिन सिमरन लन्दन में रहने के बाद भी मिडल क्लास मेंटालिटी से ऊपर नहीं उठ पाई है. बेचारी.
लेकिन उचक्के नायक की संगत का कुछ असर तो होना ही है. सिमरन शराब पी के टुन्न हो जाती है और राज को चूमने की कोशिश करते हुए गाना गाती है. राज दिल का बहुत शरीफ है. वह खुद को चूमे जाने नहीं देता. दोनों टुन्नावस्था में एक बिस्तर पर सो जाते हैं.
राज सुबह सिमरन को बताता है कि रात में एक साथ सोते हुए उन दोनों के बीच कुछ हो गया. सिमरन बहुत दुखी होती है लेकिन राज उसे बता देता है कि उसने एक भद्दा मजाक किया था. सिमरन राज की सच्चाई पर मोहित हो जाती है. दोनों धीरे-धीरे एक दूसरे पर रीझ रहे हैं.
सिमरन और राज एक दूसरे को बताते हैं कि उनके प्रेम संबन्धी विचार कितने उदात्त और पवित्र हैं. राज सिमरन को बताता है कि उसे कई लड़कियां मिलीं लेकिन प्यार किसी से नहीं हुआ. सिमरन यह जानकार खुश होती है.
एक चर्च में सिमरन के मन में अनायास ही ईश्वर से तादात्म्य उमड़ आता है. जब राज उसे देखता है तो उसे सिमरन से प्यार हो आता है. वह भी चर्च में सिमरन के लिए प्रार्थना करके आता है. सिमरन जब उससे पूछती है कि कहाँ गए थे तो वह उसे बताता है कि वह चर्च में पेशाब करके आ रहा है. राज कोई ऐसा सच नहीं बताना चाहता जिससे किसी का दिल दुखे. राज आदर्श भारतीय है.
दोनों वापस लौटने लगते हैं. राज का दिल कहता है कि सिमरन उसे पलट के ज़रूर देखेगी. सिमरन पलटती है. राज का प्यार यकीन में बदल जाता है.
सिमरन के प्रेम का पता चलने पर पूरा परिवार पंजाब लौट आता है जहाँ पिता ने परमीत से उसका रिश्ता तय कर दिया है. राज को उसके पिता कहते हैं कि अपने प्यार को हासिल कर लो वर्ना तुम्हारी जिन्दगी चौपट हो जायेगी, इसलिए वह भी पंजाब चला आता है.
राज दिल का बहुत अच्छा लड़का है. वह परमीत को चोट नहीं पहुँचाना चाहता इसलिए उसे अपनी दोस्ती के जाल में फांसकर उसके घर में एंट्री मार लेता है. पूरे परिवार में शादी की खुशियाँ फैली है और ऐसे में राज और सिमरन अपने पवित्र प्रेम को मुकम्मल करने की सौगंध लेते हैं. राज घर के हर सदस्य पर डोरे डालता है. बेचारी मंदिरा उससे प्यार करने लगती है.
राज का सामना अमरीश पूरी से होता है. अमरीश पूरी से ज्यादा अक्खड़ और मनहूस इस दुनिया में कोई नहीं है. उसके सामने राज की दाल नहीं गलती तो राज अपने कुशल अभिनय से उसे शीशे में उतारने लगता है. वह सबको अपनी बातों के जाल में फंसाने लगता है. मुहब्बत और जंग में सब जायज है. राज के पिता भी वहीं आकर नैन-मटक्का करने लगते हैं. लेकिन वे दिल के बुरे नहीं हैं.
घर में उत्सव का माहौल है. करवा चौथ का व्रत सिमरन राज के हाथों से पानी पीकर तोड़ती है. बेचारा परमीत, उसे तो पता भी नहीं है उसी के घर में दिव्य प्रेम की लौ जगी हुई है. अंत में होनेवाली ठुकाई से अनजान वह राज को जिगरी दोस्त की तरह मानता है.
राज ने ठान लिया है कि बाबूजी की मर्जी के बिना वह सिमरन को नहीं ले जायेगा. नाटक का पर्दाफाश होनेपर वह सबको अपने प्यार की दुहाई देता है. दुष्ट अमरीश पूरी न पहले पसीजा है न अब पसीजेगा! ऐसे चरित्रों को गालिया ही मिलती हैं. प्यार के दुश्मन!
बीच में नाच-गाना होता है. वह प्रेम ही क्या जिसमें संगीत न हो! अमरीश पूरी को भी अपनी जवानी याद आ जाती है. फरीदा के चेहरे पर यह देखकर जलाल आ जाता है. फरीदा आदर्श माँ है. उससे अपनी बेटी का दर्द देखा नहीं जाता. वह राज से कहती है कि सिमरन को लेकर भाग जाओ. राज वहां पर सही और गलत रास्ते की पहचान बताता है जो उसे उसकी माँ ने बताई थी. घोर मार्मिक दृश्य है यह.
राज़ खुलने पर राज़ सबसे माफी मांगता है. वह अकेले लौट जाता है. उसके सच्चे प्रेम का इस जालिम जमाने में कोई कद्रदान नहीं है. ये दुनियावाले कब समझेंगे कि दो प्रेमी जब तक शादी करके घर न बसा लें उनकी आत्मा तड़पती रहती है!?
परमीत सेठी भी सिमरन और राज के प्रेम को समझ नहीं पाता. वह सीधे लट्ठ लेकर राज पर पिल पड़ता है. वैसे तो राज की खूब सुताई होती है लेकिन अपने पिता पर पड़े एक लट्ठ का जवाब वह परमीत के दोस्तों के सर फोड़कर देता है. सर तो वह परमीत का भी फोड़ देता लेकिन इतना भी बुरा नहीं है हमारा राज! आखिर इतने दिन तक वह परमीत के घर मेहमान जो बनके रहा!
अब स्टेशन. सब पता नहीं कैसे एक ही समय पर स्टेशन आ जाते हैं. अमरीश पूरी ने सिमरन का हाथ बहुत कसके पकडा हुआ है. जब ट्रेन थोड़ी स्पीड पकड़ लेती है तो वह हाथ को छोड़कर सिमरन से कहते हैं कि राज के साथ चली जाओ. वे चाहते तो ट्रेन रुकवा सकते थे लेकिन तब फिल्म अटपटी लगती. इसलिए सिमरन चलती ट्रेन में चढ़कर राज से चिपक जाती है और अनुपम खेर ये देखकर खूब खुश होता है.
प्यार की जीत होती है. परमीत के त्याग को सब भूल जाते हैं. मंदिरा की तो कोई बात भी नहीं करता! लेकिन इतनी महान फिल्म में ऐसी टुच्ची बातों की गुंजाईश कहाँ.
हो सकता है कि मैं कहानी के कुछ अंश भूल गया हूँ लेकिन इतना कुछ याद कर लेने के बाद कम-से-कम मुझे इस बात का कोई गुमान नहीं है कि यह फिल्म भी तमाम नई हिंदी फिल्मों की तरह फोर्मूले और मसालों को लेकर बनाई गयी जिसे पता नहीं क्यों लेकिन लोगों ने सर चढ़ा लिया.
आप में से बहुत से शायद मेरी पोस्ट से इत्तेफाक न रखते हों लेकिन क्या करें... भारत और दुनिया भर का इतना बेहतरीन अर्थपूर्ण और मनोरंजक सिनेमा देख चुके हैं कि एक सरसरी औसत फिल्म को सर्वकालिक महानतम और प्रेरणादायक फिल्म का दर्जा दिया जाना हज़म नहीं हो रहा है. सही है कि फिल्म आहत नहीं करती लेकिन न तो इसने हमें लाखों सपने दिए, न हमें लाइन मारना सिखाया, न इसमें रोमांटिक प्रेम का कोई आख्यान हमें मिला. हो सकता है हममें ही कोई कमी हो. ऐसा लगे तो कह लें "बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद".
अब इतने साल बाद सबको इसपर पोस्ट ठोंकते देखकर मेरी भी इच्छा होने लगी इसपर कुछ लिखने की. इन दिनों इसपर इतना ज्यादा पढ़ा देखा कि लगने लगा जैसे यह फिल्म भारत के ही नहीं बल्कि विश्व सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर है और गुप्त काल से लेकर बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक इतनी अच्छी फिल्म नहीं बनी.
चौदह साल पहले फिल्म देखी थी इसलिए इसकी कहानी कुछ भूल सा गया हूँ. इस पोस्ट के बहाने इसकी अद्वितीय कहानी को याद करने की कोशिश भी कर लूँगा और मुझपर इस फिल्म के प्रभाव की चर्चा भी हो जायेगी.
तो फिल्म शुरू होती है लन्दन में जहाँ छिछोराई का स्वभाव लिए पिता अनुपम खेर और उनका लाड़ला शाहरुख़ बहुत खुश हैं कि बाप इंडिया में फेल हुआ था तो बेटे ने लन्दन में फेल होकर खानदान की नाक ऊंची रख ली है. जान छिड़कते हैं बाप-बेटा एक-दूसरे पर.
दूसरी ओर लन्दन में रहकर भी भारतीय सुसंस्कृत जीवनशैली को अपनाए रखी है हमारी नायिका काजोल. अमरीश पूरी अपनी दूकान से पत्थर सा चेहरा लिए लौटते हैं तो यह देखकर संतोष करते हैं कि घर में चालीस के दशक के गाने बज रहे हैं, पॉप म्यूजिक नहीं. उन्हें पता नहीं कि लड़कियां दो मिनट पहले ही रॉक एंड रोल कर रही थीं.
अब काजोल (सिमरन) और शाहरुख़ (राज) दुनिया देखने निकल पड़े हैं. इससे पहले एक लफंगई की घटना में भोला-भला राज बियर खरीदने के चक्कर में अमरीश पूरी को नाराज़ कर बैठता है. बेचारा.
हिन्दुस्तानी फिल्म है तो नायक-नायिका मिलेंगे, लडेंगे, और अंततः प्यार करने लगेंगे. कई प्रसंग आते हैं जब राज अनजाने ही सिमरन के अंतर्वस्त्रों को छेड़ बैठता है, वैसे वह बहुत मासूम है. तभी तो नायिका उससे प्यार करेगी!
यूरोप में बेचारे नायक-नायिका हलकान हुए जा रहे हैं. राज सिमरन को बहुत समझाता है कि बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती है लेकिन सिमरन लन्दन में रहने के बाद भी मिडल क्लास मेंटालिटी से ऊपर नहीं उठ पाई है. बेचारी.
लेकिन उचक्के नायक की संगत का कुछ असर तो होना ही है. सिमरन शराब पी के टुन्न हो जाती है और राज को चूमने की कोशिश करते हुए गाना गाती है. राज दिल का बहुत शरीफ है. वह खुद को चूमे जाने नहीं देता. दोनों टुन्नावस्था में एक बिस्तर पर सो जाते हैं.
राज सुबह सिमरन को बताता है कि रात में एक साथ सोते हुए उन दोनों के बीच कुछ हो गया. सिमरन बहुत दुखी होती है लेकिन राज उसे बता देता है कि उसने एक भद्दा मजाक किया था. सिमरन राज की सच्चाई पर मोहित हो जाती है. दोनों धीरे-धीरे एक दूसरे पर रीझ रहे हैं.
सिमरन और राज एक दूसरे को बताते हैं कि उनके प्रेम संबन्धी विचार कितने उदात्त और पवित्र हैं. राज सिमरन को बताता है कि उसे कई लड़कियां मिलीं लेकिन प्यार किसी से नहीं हुआ. सिमरन यह जानकार खुश होती है.
एक चर्च में सिमरन के मन में अनायास ही ईश्वर से तादात्म्य उमड़ आता है. जब राज उसे देखता है तो उसे सिमरन से प्यार हो आता है. वह भी चर्च में सिमरन के लिए प्रार्थना करके आता है. सिमरन जब उससे पूछती है कि कहाँ गए थे तो वह उसे बताता है कि वह चर्च में पेशाब करके आ रहा है. राज कोई ऐसा सच नहीं बताना चाहता जिससे किसी का दिल दुखे. राज आदर्श भारतीय है.
दोनों वापस लौटने लगते हैं. राज का दिल कहता है कि सिमरन उसे पलट के ज़रूर देखेगी. सिमरन पलटती है. राज का प्यार यकीन में बदल जाता है.
सिमरन के प्रेम का पता चलने पर पूरा परिवार पंजाब लौट आता है जहाँ पिता ने परमीत से उसका रिश्ता तय कर दिया है. राज को उसके पिता कहते हैं कि अपने प्यार को हासिल कर लो वर्ना तुम्हारी जिन्दगी चौपट हो जायेगी, इसलिए वह भी पंजाब चला आता है.
राज दिल का बहुत अच्छा लड़का है. वह परमीत को चोट नहीं पहुँचाना चाहता इसलिए उसे अपनी दोस्ती के जाल में फांसकर उसके घर में एंट्री मार लेता है. पूरे परिवार में शादी की खुशियाँ फैली है और ऐसे में राज और सिमरन अपने पवित्र प्रेम को मुकम्मल करने की सौगंध लेते हैं. राज घर के हर सदस्य पर डोरे डालता है. बेचारी मंदिरा उससे प्यार करने लगती है.
राज का सामना अमरीश पूरी से होता है. अमरीश पूरी से ज्यादा अक्खड़ और मनहूस इस दुनिया में कोई नहीं है. उसके सामने राज की दाल नहीं गलती तो राज अपने कुशल अभिनय से उसे शीशे में उतारने लगता है. वह सबको अपनी बातों के जाल में फंसाने लगता है. मुहब्बत और जंग में सब जायज है. राज के पिता भी वहीं आकर नैन-मटक्का करने लगते हैं. लेकिन वे दिल के बुरे नहीं हैं.
घर में उत्सव का माहौल है. करवा चौथ का व्रत सिमरन राज के हाथों से पानी पीकर तोड़ती है. बेचारा परमीत, उसे तो पता भी नहीं है उसी के घर में दिव्य प्रेम की लौ जगी हुई है. अंत में होनेवाली ठुकाई से अनजान वह राज को जिगरी दोस्त की तरह मानता है.
राज ने ठान लिया है कि बाबूजी की मर्जी के बिना वह सिमरन को नहीं ले जायेगा. नाटक का पर्दाफाश होनेपर वह सबको अपने प्यार की दुहाई देता है. दुष्ट अमरीश पूरी न पहले पसीजा है न अब पसीजेगा! ऐसे चरित्रों को गालिया ही मिलती हैं. प्यार के दुश्मन!
बीच में नाच-गाना होता है. वह प्रेम ही क्या जिसमें संगीत न हो! अमरीश पूरी को भी अपनी जवानी याद आ जाती है. फरीदा के चेहरे पर यह देखकर जलाल आ जाता है. फरीदा आदर्श माँ है. उससे अपनी बेटी का दर्द देखा नहीं जाता. वह राज से कहती है कि सिमरन को लेकर भाग जाओ. राज वहां पर सही और गलत रास्ते की पहचान बताता है जो उसे उसकी माँ ने बताई थी. घोर मार्मिक दृश्य है यह.
राज़ खुलने पर राज़ सबसे माफी मांगता है. वह अकेले लौट जाता है. उसके सच्चे प्रेम का इस जालिम जमाने में कोई कद्रदान नहीं है. ये दुनियावाले कब समझेंगे कि दो प्रेमी जब तक शादी करके घर न बसा लें उनकी आत्मा तड़पती रहती है!?
परमीत सेठी भी सिमरन और राज के प्रेम को समझ नहीं पाता. वह सीधे लट्ठ लेकर राज पर पिल पड़ता है. वैसे तो राज की खूब सुताई होती है लेकिन अपने पिता पर पड़े एक लट्ठ का जवाब वह परमीत के दोस्तों के सर फोड़कर देता है. सर तो वह परमीत का भी फोड़ देता लेकिन इतना भी बुरा नहीं है हमारा राज! आखिर इतने दिन तक वह परमीत के घर मेहमान जो बनके रहा!
अब स्टेशन. सब पता नहीं कैसे एक ही समय पर स्टेशन आ जाते हैं. अमरीश पूरी ने सिमरन का हाथ बहुत कसके पकडा हुआ है. जब ट्रेन थोड़ी स्पीड पकड़ लेती है तो वह हाथ को छोड़कर सिमरन से कहते हैं कि राज के साथ चली जाओ. वे चाहते तो ट्रेन रुकवा सकते थे लेकिन तब फिल्म अटपटी लगती. इसलिए सिमरन चलती ट्रेन में चढ़कर राज से चिपक जाती है और अनुपम खेर ये देखकर खूब खुश होता है.
प्यार की जीत होती है. परमीत के त्याग को सब भूल जाते हैं. मंदिरा की तो कोई बात भी नहीं करता! लेकिन इतनी महान फिल्म में ऐसी टुच्ची बातों की गुंजाईश कहाँ.
हो सकता है कि मैं कहानी के कुछ अंश भूल गया हूँ लेकिन इतना कुछ याद कर लेने के बाद कम-से-कम मुझे इस बात का कोई गुमान नहीं है कि यह फिल्म भी तमाम नई हिंदी फिल्मों की तरह फोर्मूले और मसालों को लेकर बनाई गयी जिसे पता नहीं क्यों लेकिन लोगों ने सर चढ़ा लिया.
आप में से बहुत से शायद मेरी पोस्ट से इत्तेफाक न रखते हों लेकिन क्या करें... भारत और दुनिया भर का इतना बेहतरीन अर्थपूर्ण और मनोरंजक सिनेमा देख चुके हैं कि एक सरसरी औसत फिल्म को सर्वकालिक महानतम और प्रेरणादायक फिल्म का दर्जा दिया जाना हज़म नहीं हो रहा है. सही है कि फिल्म आहत नहीं करती लेकिन न तो इसने हमें लाखों सपने दिए, न हमें लाइन मारना सिखाया, न इसमें रोमांटिक प्रेम का कोई आख्यान हमें मिला. हो सकता है हममें ही कोई कमी हो. ऐसा लगे तो कह लें "बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद".










3 comments:
अब देखिये यह कोई बात न हुयी निशांत जी -एक और आप किसे को स्ट्रिंग थियरी की याद दिलाते हैं और दूसरी और खुद दिल वाले दुलहनियां की याद ताजा करने लगते हैं -यह कालजयी करती होती तो मुझे और आप को पूरी याद रहती अब तक ! इससे तो बेहतर शोले और कुछ हद तक बाबी ही है जिनके कई दृश्य आजं भी याद हैं !
इत्ते दिन बाद...अब तो देख ही चुके..इसलिए गहरे उतर कर नहीं पढ़े.
ये दुनियावाले कब समझेंगे कि दो प्रेमी जब तक शादी करके घर न बसा लें उनकी आत्मा तड़पती रहती है!?
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