


इतने बड़े और समझदार ब्लॉगर बंधु हैं यहां पर लेकिन किसी-किसी में भाषाशैली की समझ कुछ कम है. पहले इस ब्लॉग पर कुश द्वारा दी गई टिप्पणी ध्यान से पढ़ें जिसका स्क्रीन शोट सबसे ऊपर दिया गया है:-
"आगे, यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो उन ब्लोग्स को तुंरत डिलीट किया जाते जिन पर भोजपुरी, हरयाणवी या और किसी क्षेत्रीय भाषा में कुछ लिखा जाता हो क्योंकि हमें बढा तो हिंदी को देना है.."
क्या आपको यह लग रहा है कि यह टिप्पणी क्षेत्रीय भाषाओं बोलियों का विरोध कर रही है? टिप्पणी और टिप्पणीकार का स्वर साफ-साफ यह बात कह रहे हैं कि ब्लॉगजगत सिर्फ हिंदी (में) ही लिखने के लिए नहीं है और हिंदी को बढ़ावा देने के नाम पर भोजपुरी, हरयाणवी या अन्य किसी क्षेत्रीय भाषा (या बोली) के ब्लॉग को डिलीट करना (या उनका विरोध करना) ब्लॉगजगत के हित में न होगा.
लेकिन आज मैंने दो ब्लौग ऐसे देखे जिनमें इस टिपण्णी को लेकर यह बवाल खड़ा किया गया कि एक मगरूरवा (कुश) भोजपुरी और हरियाणवी ब्लौगों को डिलीट करने के लिए कह रहा है. उनपर रोचक यह है कि कई टिप्पणीकारों ने भी कुश की टिपण्णी को समझे बिना टिपण्णी की मुखालफत शुरू कर दी.
समझदार ब्लॉगरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उद्वेलित होकर पोस्ट ठोंकने और टिपण्णी करने से पहले थोड़ी जांच-पड़ताल कर लें. सामनेवाले की बात को थोड़ा ठीक से समझ लें.
रही बात भोजपुरी और हरियाणवी ब्लौगों में लिखी जा रही सामग्री की, इनमें बहुत अच्छा और रोचक लिखा जा रहा है, और मेरी जानकारी में किसी ने भी आज तक इन ब्लौगों का विरोध नहीं किया है.
अपडेट 16-अक्टूबर-2009 समय 22:00
बहुत से ब्लॉगर बंधुओं ने इस पोस्ट में वर्णित बातों से अनभिज्ञता प्रकट की है. उनके लिए प्रस्तुत है यह सार संक्षेप
1. पाबला जी के ब्लॉग पर अपने जन्मदिन की घोषणा करनेवाली दो माह पुरानी पोस्ट को हटाने के लिए रचना जी ने अनुरोध किया.
2. आदतन, रचनाजी ने अंग्रेजी में कमेंट किए, जिन्हें पाबला जी ने यह कहकर डिलीट कर दिया कि "अंग्रेजी या रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे".
3. इस प्रकरण पर दो-तीन दिन तक खींचातानी चलती रही. नतीजा कुछ न निकला.
4. डॉ. कविता वाक्चनवी जी ने चिट्ठाचर्चा ब्लॉग पर इस प्रकरण पर बेहतरीन पोस्ट लिखी.
5. चूंकि पाबलाजी ने यह लिखा था कि "रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे (अर्थात हिंदी ब्लॉग में केवल हिंदी के कमेंट ही चलना चाहिए)", संभवतः इस बिंदु पर कुश ने चिट्ठाचर्चा ब्लॉग में अपने कमेंट में लिखा "यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो उन ब्लोग्स को तुंरत डिलीट किया जाते जिन पर भोजपुरी, हरयाणवी या और किसी क्षेत्रीय भाषा में कुछ लिखा जाता हो क्योंकि हमें बढा तो हिंदी को देना है". (संभवतः इसलिए क्योंकि कुश ही हैं जो बेहतर बता सकते हैं कि उनका कमेन्ट किस सन्दर्भ में था).
6. ध्यान दें, पाबला जी ने यह नहीं कहा कि वे हिंदी को अलावा किसी अन्य भारतीय भाषा या बोली में कमेंट स्वीकार नहीं करेंगे. उनहोंने केवल यह कहा कि "अंग्रेजी या रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे".
7. ध्यान दें, कुश ने भी यह नहीं कहा कि भोजपुरी, हरयाणवी या अन्य किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखे ब्लॉगों को डिलीट कर देना चाहिए. तो फिर कुश का कमेंट क्या कह रहा है? अब यह समझना इतना कठिन तो नहीं है कि मैं यहां भाषाशास्त्र खोलकर बैठ जाऊं.
8. कुश की टिप्पणी को उठाकर एक-दो ब्लॉगों पर छीछालेदर की गई. कई अनुभवी ब्लॉगरों ने वहां अपनी टिप्पणियां दीं जिनमें इस छीछालेदर का समर्थन किया गया.
9. यह सब मुझे नागवार गुज़रा, परिणाम यह पोस्ट.
"आगे, यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो उन ब्लोग्स को तुंरत डिलीट किया जाते जिन पर भोजपुरी, हरयाणवी या और किसी क्षेत्रीय भाषा में कुछ लिखा जाता हो क्योंकि हमें बढा तो हिंदी को देना है.."
क्या आपको यह लग रहा है कि यह टिप्पणी क्षेत्रीय भाषाओं बोलियों का विरोध कर रही है? टिप्पणी और टिप्पणीकार का स्वर साफ-साफ यह बात कह रहे हैं कि ब्लॉगजगत सिर्फ हिंदी (में) ही लिखने के लिए नहीं है और हिंदी को बढ़ावा देने के नाम पर भोजपुरी, हरयाणवी या अन्य किसी क्षेत्रीय भाषा (या बोली) के ब्लॉग को डिलीट करना (या उनका विरोध करना) ब्लॉगजगत के हित में न होगा.
लेकिन आज मैंने दो ब्लौग ऐसे देखे जिनमें इस टिपण्णी को लेकर यह बवाल खड़ा किया गया कि एक मगरूरवा (कुश) भोजपुरी और हरियाणवी ब्लौगों को डिलीट करने के लिए कह रहा है. उनपर रोचक यह है कि कई टिप्पणीकारों ने भी कुश की टिपण्णी को समझे बिना टिपण्णी की मुखालफत शुरू कर दी.
समझदार ब्लॉगरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उद्वेलित होकर पोस्ट ठोंकने और टिपण्णी करने से पहले थोड़ी जांच-पड़ताल कर लें. सामनेवाले की बात को थोड़ा ठीक से समझ लें.
रही बात भोजपुरी और हरियाणवी ब्लौगों में लिखी जा रही सामग्री की, इनमें बहुत अच्छा और रोचक लिखा जा रहा है, और मेरी जानकारी में किसी ने भी आज तक इन ब्लौगों का विरोध नहीं किया है.
अपडेट 16-अक्टूबर-2009 समय 22:00
बहुत से ब्लॉगर बंधुओं ने इस पोस्ट में वर्णित बातों से अनभिज्ञता प्रकट की है. उनके लिए प्रस्तुत है यह सार संक्षेप
1. पाबला जी के ब्लॉग पर अपने जन्मदिन की घोषणा करनेवाली दो माह पुरानी पोस्ट को हटाने के लिए रचना जी ने अनुरोध किया.
2. आदतन, रचनाजी ने अंग्रेजी में कमेंट किए, जिन्हें पाबला जी ने यह कहकर डिलीट कर दिया कि "अंग्रेजी या रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे".
3. इस प्रकरण पर दो-तीन दिन तक खींचातानी चलती रही. नतीजा कुछ न निकला.
4. डॉ. कविता वाक्चनवी जी ने चिट्ठाचर्चा ब्लॉग पर इस प्रकरण पर बेहतरीन पोस्ट लिखी.
5. चूंकि पाबलाजी ने यह लिखा था कि "रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे (अर्थात हिंदी ब्लॉग में केवल हिंदी के कमेंट ही चलना चाहिए)", संभवतः इस बिंदु पर कुश ने चिट्ठाचर्चा ब्लॉग में अपने कमेंट में लिखा "यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो उन ब्लोग्स को तुंरत डिलीट किया जाते जिन पर भोजपुरी, हरयाणवी या और किसी क्षेत्रीय भाषा में कुछ लिखा जाता हो क्योंकि हमें बढा तो हिंदी को देना है". (संभवतः इसलिए क्योंकि कुश ही हैं जो बेहतर बता सकते हैं कि उनका कमेन्ट किस सन्दर्भ में था).
6. ध्यान दें, पाबला जी ने यह नहीं कहा कि वे हिंदी को अलावा किसी अन्य भारतीय भाषा या बोली में कमेंट स्वीकार नहीं करेंगे. उनहोंने केवल यह कहा कि "अंग्रेजी या रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे".
7. ध्यान दें, कुश ने भी यह नहीं कहा कि भोजपुरी, हरयाणवी या अन्य किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखे ब्लॉगों को डिलीट कर देना चाहिए. तो फिर कुश का कमेंट क्या कह रहा है? अब यह समझना इतना कठिन तो नहीं है कि मैं यहां भाषाशास्त्र खोलकर बैठ जाऊं.
8. कुश की टिप्पणी को उठाकर एक-दो ब्लॉगों पर छीछालेदर की गई. कई अनुभवी ब्लॉगरों ने वहां अपनी टिप्पणियां दीं जिनमें इस छीछालेदर का समर्थन किया गया.
9. यह सब मुझे नागवार गुज़रा, परिणाम यह पोस्ट.










28 comments:
सही कह रहे हैं आप
संदर्भ से काट कर जब भी इस तरह वक्तव्य लिये जाते है तो उनका मतलब कुछ भी लिया जा सकता है
मुझे भी कुश की टिप्पणी में कुछ भी गलत नहीं लगा था
कमाल है! लोग अपनी पोस्ट को चर्चित करने-करवाने के लिए सही बात का सही आशय तक समझने का कष्ट नहीं करते!!
हल्ला बोलने का शौक अच्छी चीज है पर सही बात के खिलाफ हल्ला??.... हद है ..
या वास्तव में भाषाज्ञान का चक्कर है जो हिन्दी के पक्ष में लिखे सीधे-सीधे वाक्य को समझने में द्रविड़ प्राणायाम करना पड़ रहा है लोगों को|
मुझे तो बाद का यह किस्सा पता ही न था, जबकि मेरी ही चर्चा पर तो कुश ने यह टिप्पणी दी थी.
निशांत जी,
यदि यह बेकार की बहस है तो कृपया उस संदर्भ का उल्लेख करें जिसके संदर्भ में कुश जी ने लिखा है कि
यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए ...
यदि यह बता पाएँ कि किसने लिखा था कि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो बड़ी कृपा होगी। यदि इस कथन वाली पोस्ट/ टिप्पणी का लिंक दे पाएं तो अग्रिम धन्यवाद।
यदि यह भी स्पष्ट हो जाए कि हिंदी को बढ़ावा देने के नाम पर अंग्रेजी भाषा में या अंग्रेजी लिपि में लिखा जाना बेहतर है क्या?
तो फिर सोने पर सुहागा हो जाए।
बहस को सार्थक बनाईए, बेकार की बहस क्या करनी।
बी एस पाबला
" आगे, यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो उन ब्लोग्स को तुंरत डिलीट किया जाते "
तौबा मेरे दी सौं, यहाँ भाषा की समझ को लेकर कोई बहस चल रही होगी, यह सोच मैं भी चला आया ।
ज़रूरत ’ यदि’ और ’तो’ पर जोर देकर, इस वाक्य में निहित वक्रोक्ति को महसूस करने की है, तौबा मेरी तौबा !
@ पाबला जी, आप तो सर्वज्ञ हैं, आप मेरी पोस्ट के केंद्र में नहीं हैं लेकिन घूम-फिर के सूत्र आपको भी छू ही लेंगे.
http://bspabla.blogspot.com/2009/10/blog-post_09.html
http://bspabla.blogspot.com/2009/10/blog-post_11.html
ऊपर दी गई आपके ब्लौग के पोस्ट की दोनों लिंक्स के विषयवस्तु में भाषा का प्रश्न अनचाहे ही खडा हो गया था. आपने अपनी बात पर जोर देते हुए कि "रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे", आपने रचनाजी के कमेंट्स डिलीट कर दिए. मैं कभी रोमन में कमेंट्स नहीं करता लेकिन आपकी जगह मैं होता तो शायद कमेंट्स डिलीट नहीं करता. खैर, उस बात का इस पोस्ट से संबध न के बराबर ही है. कविता जी ने भी अपनी चिटठा-चर्चा में भाषागत प्रश्न नहीं उठाये बल्कि "भाषा के नाम पर विवाद और कु -तर्क करने वालों की आँखें खोलने वाले एक आलेख का उल्लेख" किया.
अब शायद आप पूछेंगे कि चिटठा-चर्चा की उक्त पोस्ट में कुश का कमेन्ट किस सन्दर्भ में था तो आपको वहीं जाकर पोस्ट के कुछ कमेंट्स पढने होंगे जिन्हें इस टिपण्णी में देने की आवश्यकता नहीं है.
यस पोस्ट या बहस कह लें इस बात की नहीं है कि "हिंदी को बढ़ावा देने के नाम पर अंग्रेजी भाषा में या अंग्रेजी लिपि में लिखा जाना बेहतर है क्या?" यह पोस्ट सिर्फ इस बात को ध्यान में रखकर लिखी गई है कि कुश का कमेन्ट (भले ही वह आपके ब्लौग की उपरोक्त पोस्टों की ओर इंगित करता हो) भोजपुरी और हरियाणवी ब्लौगों को डिलीट करने की हिदायत नहीं दे रहा है, जैसा कुछ ब्लौगर बंधू इसे प्रचारित करके इसकी लानत-मलानत कर रहे हैं.
चिटठा-चर्चा पर डॉ. कविता जी की संदर्भित पोस्ट का लिंक यह है:-
http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/10/blog-post_12.html
और कुश की टिपण्णी की खिंचाई करनेवाली पोस्टों के लिंक ये हैं:-
http://tippanicharcha.blogspot.com/2009/10/blog-post_12.html
http://rajtantr.blogspot.com/2009/10/blog-post_15.html
चिट्ठा चर्चा पर भी मैंने संक्षिप्ततः कह दिया था कि कुश की टिप्पणी में कुछ भी अवांछित नहीं लग रहा मुझे ।
यहाँ आपसे पूर्णतया सहमत हूँ कि टिप्पणी की समझ में गलती हुई है ।
यह बात भी सही है कि आज तक किसी क्षेत्रीय भाषा/बोली के ब्लॉग्स का विरोध लगभग नहीं ही हुआ है । प्रविष्टि का आभार ।
बहुत बहुत धन्यवाद निशांत जी,
यह जानकर तसल्ली हुई कि मैंने नहीं लिखा था कि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए।
मैं एक अपराधबोध से बच गया।
बी एस पाबला
ओह, तो मामला छटाँक भर सेंस ऑफ़ ह्यूमर का है! :)
एक पुराना व्यंज़ल यहाँ ठेलता हूं -
कूड़ामय ब्लॉगिंग जारी आहे....
व्यंज़ल
------.
छटांक भर सेंस ऑफ़ ह्यूमर तो लाओ यार
माना जिंदगी कठिन है कभी तो हंसो यार
जमाना पढ़े या न पढ़े तुम्हें रोक नहीं सकता
कूड़ा लिखो कचरा लिखो कुछ तो लिखो यार
यूँ इस तरह जमाने का मुँह ताकने से क्या
कुछ नया सा इतिहास तुम भी तो रचो यार
ऐसी बहसों का यूं कोई प्रतिफल नहीं होता
पर बहस के नाम पर किंचित तो कहो यार
मालूम है कि लोग हंसेंगे मेरी बातों पे रवि
जब बूझेंगे पछताएंगे जरा ठंड तो रखो यार
-------
पूरी पोस्ट (संदर्भित लिंक सहित) यहाँ पढ़ें -
http://raviratlami.blogspot.com/2008/01/blog-post_22.html
इसका कारण है बिना पढे और समझे टिपण्णी देना और उसका कारण है ज्यादा से ज्यादा टिपण्णी पाने की चाह मे ज्यादा टिपण्णी देने की हडबडी।हो सकता है कि कुछ लोगो को ये बात भी गलत लगे लेकिन ये सच है कम से कम समय मे ज्यादा टिपण्णी देने की कोशिश मे कई बार बात को सम्झे बिना या पहले क्मेण्ट के आधार पर दूसरा कमेण्ट कर दिया जाता है जो बाद मे अप्रिय स्थिति का कारण बन जाता है।खैर जाने दिजीये
आपको और आपके परिवार को दीवाली की शुभकामनाएँ
लोग किसी की बात का अपने पूर्वाग्रह के हिसाब से मतलब निकालते हैं फ़िर उसके खिलाफ़ मोर्चा खोलते हैं। अच्छा लगा कि आपने इस तरफ़ इशारा किया।
जब किसी का सिर तोप में फँस जाय तो वह ऐसी ही हरकत करता है ।
मन क्लांत हो गया है यह सब पढ़ कर ..यहाँ हो क्या रहा है ईश्वर जाने.
http://murakhkagyan.blogspot.com/2009/10/blog-post_13.html
कुश की टिप्पणी का ऐसा मतलब वही निकाल सकता है जो पूर्वाग्रह से ओत-प्रोत हो.
पूर्वाग्रह को हमारे पूर्वजों ने नौ ग्रहों में क्यों नहीं रखा? मेरा तो मानना है कि सब ग्रहों से बड़ा यही ग्रह है. वृहस्पति से भी बड़ा.
वाह.. एक विवाद यहां भी.. फिर से एक और अनसुलझे और बेबात के विवाद का मजा सभी ले सकेंगे कुछ दिनों तक.. :)
सार्थक बहसों में लोग मौन रहते है या समझदारी भरी चुप्पी ओड कर निकल जाते है .....अपने अपने पूर्वाग्रह को निकालने के बहाने ऐसी निरर्थक बहसों का इस्तेमाल करते है ...दुःख ओर हैरानी के साथ निराशा तब होती है जब इसमें वो ब्लोगर भी होते है जिन्हें सो कॉल्ड वरिष्ट ब्लोगर कहा जाता है ...टिपण्णी इतनी महत्वपूर्ण है ब्लॉग जगत में की कोई किसी को नाराज नहीं करना चाहता .....कभी कभी सोचता हूं यदि गूगल ब्लॉग बन्द करने की घोषणा कर दे .तो ?
सच कहूं तो अब मन नहीं करता इन सब में पडने का..मगर अब लगता है कि जब इतना कुछ इतने लोगों ने कहा ही है तो मैं भी अपने मन की बात रख ही दूं। संदर्भ पे संदर्भ ..पोस्ट दर पोस्ट बात आगे बढाई जा रही है। जहां तक मैं समझा वो अब आपके सामने रख रहा हूं।
ये बात शुरु हुई थी ..पाबला जी के एक पोस्ट पर ..आंग्ल एवम रोमन में लिखे गये टीपों को हटाने को लेकर..बात आगे बढी चर्चा में कविता जी के माध्यम से..उससे आगे उसी पोस्ट में की गयी टिप्पणी से .इसके बाद टिप्पू चच्चा की टिप्पणी चर्चा में. फ़िर राज भाई की पोस्ट और अब आप।
सबके मत अलग अलग हैं..सब अलग अलग विचार भी रख रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि जब पाबला जी ने ये टीप हटाई उसका कारण हिंदी के इतर और भी कुछ रहा होगा..आप खुद ही बताईये कि यदि आपको कोइ भर भर के अंग्रेजी में आलोचना देगा आपके हिंदी ब्लोग पर ..हिंदी पोस्ट पर ..खासकर वे जो खुद कई कारणों से कभी टिप्पणी को हटा देते हैं तो कभी कुछ भडकाने वाला या तथाकथित आपत्ति दर्ज़ करवा के ..अपने यहां टिप्पणी का द्वार बंद कर देते हैं..और ऐसा एक नहीं अनेकों बार हुआ है..तो फ़िर खुद की टीप मिटने से दुख क्यों..। अब बात हिंदी या अंग्रेजी...तो मेरा मानना तो है कि भाषा हिंदी, अंग्रेजी..या कोई भी अन्य उतनी ही मान्य और महत्वपूर्ण है। मगर इसका मतलब ये नहीं हो सकता न कि आप हिंदी में ही घुस कर हिंदी के सहारे..अंग्रेजियत झाडते हुए हिंदी को और उससे जुडे हुए तमाम गुण दोषों को कोसते रहें ..गलियाते रहें। और ऐसा भी होता रहा है। मुझे इस बात से आपत्ति है और रहेगी भी। आप खुद ही बताईये न क्या ये काम आप अंग्रेजी ब्लोग्गिंग में कर सकते हैं। ......?
अब बात अन्य भाषाओं को बंद करने करवाने के मत पर ..तो ठीक ठीक तो ये सिर्फ़ कुश ही बता सकते हैं। वैसे यहां ये बताना शायद समीचीन होगा कि वे सभी ब्लोग्स बेशक लिखे किसी भी भाषा में जा रहे हों..मगर देवनागिरी में ही हैं। शायद आप गौर कर सके हों कि चिट्ठाजगत भी ब्लोग्स को रजिस्टर करते समय यही दिखाता है..ध्यान रहे कि आपका ब्लोग शीर्षक हिंदी में हो ...जैसा ही कुछ।
और हां मैं किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हूं। पहले लगा कि ये बात किसी पोस्ट में कह दूं ..मगर इन विवादों/बातों का पटाक्षेप जल्दी हो जाए तो बेहतर होता है। इन परिस्थितियों एक और कारगर तरीका होता है ..स्वयं उनके द्वारा सारी स्थिति को स्पष्ट कर देना जिनके कथन का अर्थ या अनर्थ किया जा रहा है।
आप सबको दीपावली की शुभकामनाएं....और इन सब बातों से ब्लोग न बंद हुए हैं न होंगे।
विवेक जी की बातो से सहमत ....
जब किसी का सर तोप में फस जाता है तो या तो वो ऐसी हरकत करता है या किसी और से करवाता है ......
आपको दीपावली की शुभकामना .............
हम उन महान ब्लागरों को नमन करते हैं जो यह बात कर रहे हैं कि कुश जी टिप्पणी पर पूर्वाग्रह से क्षेत्रीय भाषाओं में लिखने से एतराज क्यों? लेख लिखा गया है। सबसे पहली बात यह है कि हम जिस कुश जी को जानते नहीं हैं उनसे हमारा कैसा पूर्वाग्रह? फिर दूसरी बात यह कि हमारे पास हमारे मित्र ललित शर्मा का फोन आया था और उनके बताने के बात जब हमने टिप्पणी चर्चा वाले ब्लाग को पढ़ा तो उससे ऐसा ही लगा कि कोई जनाव भोजपुरी और हरियाणवी सहित क्षेत्रीय भाषाओं के ब्लाग के खिलाफ हैं। यही वजह रही कि ऐसी पोस्ट लिखी गई। अब तक जिन जनाब की टिप्पणी को लेकर बहस हो रही है, वह जनाब तो सामने आए ही नहीं हैं। पाबला जी ने भी पूछा था हम भी पूछा रहे हैं कि आखिर ऐसी टिप्पणी कहां की गई उसका लिंक क्या है? जिस पर इतनी बहस हो रही है। एक बार फिर से कहना चाहेंगे कि किसी पर पूर्वाग्रह का आरोप लगाने से पहले सौ बार सोचना चाहिए। हमारी कोई कुश जी से दुश्मनी नहीं है कि हम उनसे पूर्वाग्रह में लिखने का काम करेंगे। और एक बात हम और बता दें कि हमें किसी से पूर्वाग्रह पालने की जरूरत नहीं है, जिस दिन लगेगा कि ब्लाग बिरादरी में पूर्वाग्रह वाला रोग लग गया है तो हम ब्लाग बिरादरी से किनारा कर लेंगे। वैसे ब्लाग लिखना हमारी मजबूरी नहीं है क्योंकि हमें छपने का कोई शौक नहीं है, हम विगत दो दशक से ज्यादा समय से अखबार में काम कर रहे हैं और साथ ही एक पत्रिका भी निकालते हैं। हमारे पास वैसे भी इतना समय नहीं रहता है कि हम किसी से पूर्वाग्रह पाले और किसी के खिलाफ भी उल्टा सीधा लिखने का काम करें।
विवेक ने बिल्कलु सही कहा
जब किसी का सिर तोप में फँस जाय तो वह ऐसी ही हरकत करता है ।
पर ये तो बताइए कि कुश का सिर तोप में कैसे फंसा था?
मामला पूरा स्पष्ट कीजिए.तभी तो हम मुवक्किल की पैरवी कर पाएंगे!
लिखने के लिए यहाँ मुद्दों की कोई कमी नहीं है....वैसे भी मुद्दे कहीं ढूंढने थोडे ही जाना पडता है...सीधा सा फार्मूला है कहीं कुछ पढ लो तो उसी को अपने मनमाफिक अर्थ लगा कर मुद्दा बना डालो ।
हमें तो लगता है कि यदि यही हाल रहा तो निकट भविष्य में हिन्दी ब्लागिंग की नईं परिभाषाएं गढी जाएंगी ।
हिन्दी ब्लागिंग अर्थात "चाटुकारिता"
हिन्दी ब्लागिंग यानि "बेफालतू का विवाद"
महाभारत में एक कहानी थी ....
"अश्वथामा मारा गया " इसका इस्तेमाल.....यहां वही सीन है.... .गौतम राजरिशी को गोली लगने के बाद मेरी पोस्ट पे लोग दशहरे की शुभकानाये लिख जाते है....आप क्या उम्मीद करगे ......?
दीपावली की शुभकामनाएं !!!!
डा. साहब गुस्ताखी माफ़ की जाय
क्या आप उस पोस्ट का लिंक यहाँ दे सकते है जहा पर आपको दशहरे की शुभकामनाये दिया गया है ?
जिस दिन मेजर साहब को गोली लगी थी तो कुश जी ने चर्चा की थी और जब वहा पर लगभग ८ लोग उनके चर्चा और फार्मेट की तारीफ़ करके आ गए तो उन्होंने आपसे मिली अपडेट लगा दिया तो आप क्या कहेगे ?
क्या वो लोग गलत थे जो पहले सिर्फ कलेवर की क\बखान करके आ गए थे और बाद में जो पहुचा वो मेजर साहब के शीघ्र स्वास्थय लाभ की कामना किया .
तो आप अब ये बताओ गलती किसकी जो वहा कलेवर की चर्चा करके आया या वो जो बाद में ऐसी खबर एड किया .
क्या वहा पर दूसरी पोस्ट लिखना तर्कसंगत नहीं था ...ऐसे जगह पर तो मेजर साहब के लिए दूसरी पोस्ट लिखनी चाहिए थी .
शायद आपने भी कुछ ऐसा ही किया होगा कि दशहरा के पोस्ट लगाई होगी तो लोगो ने दशहरा की शुभकामनाये दी ....
मेजर साहब से हम सबका लगाव है और इस बगाजग्त का हर बन्दा मेजर गौतम के शीघ्र स्वास्थय लाभ की कामना कर रहा था दिल से भगवान् को याद कर .....
आपको दीपावली की शुभकामना
चर्चा का लिंक ये है
http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html
awaiting your response!!!
अब मैं अपनी टिप्पणी मे क्या लिखूँ, बड़ें धर्म संकट में फँस गया हूँ।
ह्लॉगिंग में तो मैं सभी को विद्वान ही मानता हूँ। लेकिन भूल-चूक तो सभी से सम्भव है और जो इसको स्वीकार कर लेता है वही महानता की श्रेणी मे आते हैं। अन्यथा मात्र मठाधीश कहलाते हैं।
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