जिसके मन को भाया, वो कुत्ता मार के खाया!

पहले कहीं पढ़ा था कि साउथ कोरिया में कुत्तो को बड़े चाव से खाया जाता है. भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में भी कहीं-कहीं कुत्तों को रीतिपूर्वक घेरकर मारने और फिर पकाकर खाए जाने का रिवाज है. आज इन्टरनेट पर यह पढ़ा कि साउथ कोरिया में प्रतिवर्ष बीस लाख कुत्तों को भोजन के लिए मार दिया जाता है. जिस तरह हमारे यहाँ लोग मुर्गे-बकरे पालते हैं उसी प्रकार वहां कुत्ते पाले जाते हैं ताकि उन्हें काटकर खाने के लिए बड़ा किया जा सके.

हर साल बीस लाख कुत्ते! इस तरह तो रोज़ लगभग पांच हज़ार से ज्यादा कुत्तों को दम घोंटकर, जलाकर, बिजली के झटके देकर या पीटकर मार डाला जाता है.

साउथ कोरिया की सरकार ने पशुअधिकार कानूनों को लागू किया है जिनके अनुसार पशुओं के प्रति क्रूरता बरतने पर निषेध है लेकिन ऐसे कानून किसी भी देश में माने नहीं जाते. कुत्तों के मांस का उद्योग वहां बहुत फल-फूल रहा है. यह बात और है कि 1988 के सियोल ओलंपिक और 2002 के फीफा कप के दौरान वहां कुत्तों के मांस की बिक्री अस्थाई रूप से रोक दी गयी थी ताकि साउथ कोरिया की छवि को धब्बा न लगे.

भोजनालयों को वहां पर सार्वजनिक रूप से कुत्ते के मांस से बने व्यंजनों (?) का प्रचार करने की मनाही है लेकिन अकेले सियोल में ही लगभग 6000रेस्टुरेंट कुत्ते का मांस परोसते हैं. स्थानीय लोग भी इसे बुरा नहीं मानते.

मैं तो अंडा भी नहीं खाता. किसी भी पशु का शरीर फाड़कर उसकी चमड़ी, हड्डी, खून अलग करके उसे चटखारे लेकर खाने का विचार ही मेरे मन में वितृष्णा पैदा करता है. वैसे तो मुर्गे-बकरे ने भी इंसानों का कुछ कभी नहीं बिगाड़ा लेकिन कुत्ते तो मनुष्य के सबसे वफादार मित्र माने जाते हैं. आखिर कोई कैसे खा सकता है किसी कुत्ते को!?

यदि आप कुत्तों के अधिकारों की रक्षा में भागीदारी करना चाहते हैं तो इस पृष्ठ पर जाकर ऑनलाइन पिटीशन पर हस्ताक्षर कर सकते हैं.

DDLJ की खूबसूरत कहानी और उसका रिव्यू

"दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे". चौदह साल हो गए यह फिल्म देखे हुए. उन दिनों ग्रेजुएशन में था. फिल्म का खूब हल्ला हुआ तो सपरिवार एक बार देख आये. दूसरी बार देखना तब हुआ जब अपने एक दोस्त की जानपहचान के कारण भोपाल के ज्योति सिनेमा में फोकट में एंट्री मिल गयी.

अब इतने साल बाद सबको इसपर पोस्ट ठोंकते देखकर मेरी भी इच्छा होने लगी इसपर कुछ लिखने की. इन दिनों इसपर इतना ज्यादा पढ़ा देखा कि लगने लगा जैसे यह फिल्म भारत के ही नहीं बल्कि विश्व सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर है और गुप्त काल से लेकर बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक इतनी अच्छी फिल्म नहीं बनी.

चौदह साल पहले फिल्म देखी थी इसलिए इसकी कहानी कुछ भूल सा गया हूँ. इस पोस्ट के बहाने इसकी अद्वितीय कहानी को याद करने की कोशिश भी कर लूँगा और मुझपर इस फिल्म के प्रभाव की चर्चा भी हो जायेगी.

तो फिल्म शुरू होती है लन्दन में जहाँ छिछोराई का स्वभाव लिए पिता अनुपम खेर और उनका लाड़ला शाहरुख़ बहुत खुश हैं कि बाप इंडिया में फेल हुआ था तो बेटे ने लन्दन में फेल होकर खानदान की नाक ऊंची रख ली है. जान छिड़कते हैं बाप-बेटा एक-दूसरे पर.

दूसरी ओर लन्दन में रहकर भी भारतीय सुसंस्कृत जीवनशैली को अपनाए रखी है हमारी नायिका काजोल. अमरीश पूरी अपनी दूकान से पत्थर सा चेहरा लिए लौटते हैं तो यह देखकर संतोष करते हैं कि घर में चालीस के दशक के गाने बज रहे हैं, पॉप म्यूजिक नहीं. उन्हें पता नहीं कि लड़कियां दो मिनट पहले ही रॉक एंड रोल कर रही थीं.

अब काजोल (सिमरन) और शाहरुख़ (राज) दुनिया देखने निकल पड़े हैं. इससे पहले एक लफंगई की घटना में भोला-भला राज बियर खरीदने के चक्कर में अमरीश पूरी को नाराज़ कर बैठता है. बेचारा.

हिन्दुस्तानी फिल्म है तो नायक-नायिका मिलेंगे, लडेंगे, और अंततः प्यार करने लगेंगे. कई प्रसंग आते हैं जब राज अनजाने ही सिमरन के अंतर्वस्त्रों को छेड़ बैठता है, वैसे वह बहुत मासूम है. तभी तो नायिका उससे प्यार करेगी!

यूरोप में बेचारे नायक-नायिका हलकान हुए जा रहे हैं. राज सिमरन को बहुत समझाता है कि बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती है लेकिन सिमरन लन्दन में रहने के बाद भी मिडल क्लास मेंटालिटी से ऊपर नहीं उठ पाई है. बेचारी.

लेकिन उचक्के नायक की संगत का कुछ असर तो होना ही है. सिमरन शराब पी के टुन्न हो जाती है और राज को चूमने की कोशिश करते हुए गाना गाती है. राज दिल का बहुत शरीफ है. वह खुद को चूमे जाने नहीं देता. दोनों टुन्नावस्था में एक बिस्तर पर सो जाते हैं.

राज सुबह सिमरन को बताता है कि रात में एक साथ सोते हुए उन दोनों के बीच कुछ हो गया. सिमरन बहुत दुखी होती है लेकिन राज उसे बता देता है कि उसने एक भद्दा मजाक किया था. सिमरन राज की सच्चाई पर मोहित हो जाती है. दोनों धीरे-धीरे एक दूसरे पर रीझ रहे हैं.

सिमरन और राज एक दूसरे को बताते हैं कि उनके प्रेम संबन्धी विचार कितने उदात्त और पवित्र हैं. राज सिमरन को बताता है कि उसे कई लड़कियां मिलीं लेकिन प्यार किसी से नहीं हुआ. सिमरन यह जानकार खुश होती है.

एक चर्च में सिमरन के मन में अनायास ही ईश्वर से तादात्म्य उमड़ आता है. जब राज उसे देखता है तो उसे सिमरन से प्यार हो आता है. वह भी चर्च में सिमरन के लिए प्रार्थना करके आता है. सिमरन जब उससे पूछती है कि कहाँ गए थे तो वह उसे बताता है कि वह चर्च में पेशाब करके आ रहा है. राज कोई ऐसा सच नहीं बताना चाहता जिससे किसी का दिल दुखे. राज आदर्श भारतीय है.

दोनों वापस लौटने लगते हैं. राज का दिल कहता है कि सिमरन उसे पलट के ज़रूर देखेगी. सिमरन पलटती है. राज का प्यार यकीन में बदल जाता है.

सिमरन के प्रेम का पता चलने पर पूरा परिवार पंजाब लौट आता है जहाँ पिता ने परमीत से उसका रिश्ता तय कर दिया है. राज को उसके पिता कहते हैं कि अपने प्यार को हासिल कर लो वर्ना तुम्हारी जिन्दगी चौपट हो जायेगी, इसलिए वह भी पंजाब चला आता है.

राज दिल का बहुत अच्छा लड़का है. वह परमीत को चोट नहीं पहुँचाना चाहता इसलिए उसे अपनी दोस्ती के जाल में फांसकर उसके घर में एंट्री मार लेता है. पूरे परिवार में शादी की खुशियाँ फैली है और ऐसे में राज और सिमरन अपने पवित्र प्रेम को मुकम्मल करने की सौगंध लेते हैं. राज घर के हर सदस्य पर डोरे डालता है. बेचारी मंदिरा उससे प्यार करने लगती है.

राज का सामना अमरीश पूरी से होता है. अमरीश पूरी से ज्यादा अक्खड़ और मनहूस इस दुनिया में कोई नहीं है. उसके सामने राज की दाल नहीं गलती तो राज अपने कुशल अभिनय से उसे शीशे में उतारने लगता है. वह सबको अपनी बातों के जाल में फंसाने लगता है. मुहब्बत और जंग में सब जायज है. राज के पिता भी वहीं आकर नैन-मटक्का करने लगते हैं. लेकिन वे दिल के बुरे नहीं हैं.

घर में उत्सव का माहौल है. करवा चौथ का व्रत सिमरन राज के हाथों से पानी पीकर तोड़ती है. बेचारा परमीत, उसे तो पता भी नहीं है उसी के घर में दिव्य प्रेम की लौ जगी हुई है. अंत में होनेवाली ठुकाई से अनजान वह राज को जिगरी दोस्त की तरह मानता है.

राज ने ठान लिया है कि बाबूजी की मर्जी के बिना वह सिमरन को नहीं ले जायेगा. नाटक का पर्दाफाश होनेपर वह सबको अपने प्यार की दुहाई देता है. दुष्ट अमरीश पूरी न पहले पसीजा है न अब पसीजेगा! ऐसे चरित्रों को गालिया ही मिलती हैं. प्यार के दुश्मन!

बीच में नाच-गाना होता है. वह प्रेम ही क्या जिसमें संगीत न हो! अमरीश पूरी को भी अपनी जवानी याद आ जाती है. फरीदा के चेहरे पर यह देखकर जलाल आ जाता है. फरीदा आदर्श माँ है. उससे अपनी बेटी का दर्द देखा नहीं जाता. वह राज से कहती है कि सिमरन को लेकर भाग जाओ. राज वहां पर सही और गलत रास्ते की पहचान बताता है जो उसे उसकी माँ ने बताई थी. घोर मार्मिक दृश्य है यह.

राज़ खुलने पर राज़ सबसे माफी मांगता है. वह अकेले लौट जाता है. उसके सच्चे प्रेम का इस जालिम जमाने में कोई कद्रदान नहीं है. ये दुनियावाले कब समझेंगे कि दो प्रेमी जब तक शादी करके घर न बसा लें उनकी आत्मा तड़पती रहती है!?

परमीत सेठी भी सिमरन और राज के प्रेम को समझ नहीं पाता. वह सीधे लट्ठ लेकर राज पर पिल पड़ता है. वैसे तो राज की खूब सुताई होती है लेकिन अपने पिता पर पड़े एक लट्ठ का जवाब वह परमीत के दोस्तों के सर फोड़कर देता है. सर तो वह परमीत का भी फोड़ देता लेकिन इतना भी बुरा नहीं है हमारा राज! आखिर इतने दिन तक वह परमीत के घर मेहमान जो बनके रहा!

अब स्टेशन. सब पता नहीं कैसे एक ही समय पर स्टेशन आ जाते हैं. अमरीश पूरी ने सिमरन का हाथ बहुत कसके पकडा हुआ है. जब ट्रेन थोड़ी स्पीड पकड़ लेती है तो वह हाथ को छोड़कर सिमरन से कहते हैं कि राज के साथ चली जाओ. वे चाहते तो ट्रेन रुकवा सकते थे लेकिन तब फिल्म अटपटी लगती. इसलिए सिमरन चलती ट्रेन में चढ़कर राज से चिपक जाती है और अनुपम खेर ये देखकर खूब खुश होता है.

प्यार की जीत होती है. परमीत के त्याग को सब भूल जाते हैं. मंदिरा की तो कोई बात भी नहीं करता! लेकिन इतनी महान फिल्म में ऐसी टुच्ची बातों की गुंजाईश कहाँ.

हो सकता है कि मैं कहानी के कुछ अंश भूल गया हूँ लेकिन इतना कुछ याद कर लेने के बाद कम-से-कम मुझे इस बात का कोई गुमान नहीं है कि यह फिल्म भी तमाम नई हिंदी फिल्मों की तरह फोर्मूले और मसालों को लेकर बनाई गयी जिसे पता नहीं क्यों लेकिन लोगों ने सर चढ़ा लिया.

आप में से बहुत से शायद मेरी पोस्ट से इत्तेफाक न रखते हों लेकिन क्या करें... भारत और दुनिया भर का इतना बेहतरीन अर्थपूर्ण और मनोरंजक सिनेमा देख चुके हैं कि एक सरसरी औसत फिल्म को सर्वकालिक महानतम और प्रेरणादायक फिल्म का दर्जा दिया जाना हज़म नहीं हो रहा है. सही है कि फिल्म आहत नहीं करती लेकिन न तो इसने हमें लाखों सपने दिए, न हमें लाइन मारना सिखाया, न इसमें रोमांटिक प्रेम का कोई आख्यान हमें मिला. हो सकता है हममें ही कोई कमी हो. ऐसा लगे तो कह लें "बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद".
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कुश की टिप्पणी को लेकर बेकार की बहस




इतने बड़े और समझदार ब्लॉगर बंधु हैं यहां पर लेकिन किसी-किसी में भाषाशैली की समझ कुछ कम है. पहले इस ब्लॉग पर कुश द्वारा दी गई टिप्पणी ध्यान से पढ़ें जिसका स्क्रीन शोट सबसे ऊपर दिया गया है:-

"आगे, यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो उन ब्लोग्स को तुंरत डिलीट किया जाते जिन पर भोजपुरी, हरयाणवी या और किसी क्षेत्रीय भाषा में कुछ लिखा जाता हो क्योंकि हमें बढा तो हिंदी को देना है.."

क्या आपको यह लग रहा है कि यह टिप्पणी क्षेत्रीय भाषाओं बोलियों का विरोध कर रही है? टिप्पणी और टिप्पणीकार का स्वर साफ-साफ यह बात कह रहे हैं कि ब्लॉगजगत सिर्फ हिंदी (में) ही लिखने के लिए नहीं है और हिंदी को बढ़ावा देने के नाम पर भोजपुरी, हरयाणवी या अन्य किसी क्षेत्रीय भाषा (या बोली) के ब्लॉग को डिलीट करना (या उनका विरोध करना) ब्लॉगजगत के हित में न होगा.

लेकिन आज मैंने दो ब्लौग ऐसे देखे जिनमें इस टिपण्णी को लेकर यह बवाल खड़ा किया गया कि एक मगरूरवा (कुश) भोजपुरी और हरियाणवी ब्लौगों को डिलीट करने के लिए कह रहा है. उनपर रोचक यह है कि कई टिप्पणीकारों ने भी कुश की टिपण्णी को समझे बिना टिपण्णी की मुखालफत शुरू कर दी.

समझदार ब्लॉगरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उद्वेलित होकर पोस्ट ठोंकने और टिपण्णी करने से पहले थोड़ी जांच-पड़ताल कर लें. सामनेवाले की बात को थोड़ा ठीक से समझ लें.

रही बात भोजपुरी और हरियाणवी ब्लौगों में लिखी जा रही सामग्री की, इनमें बहुत अच्छा और रोचक लिखा जा रहा है, और मेरी जानकारी में किसी ने भी आज तक इन ब्लौगों का विरोध नहीं किया है.

अपडेट 16-अक्टूबर-2009 समय 22:00

बहुत से ब्लॉगर बंधुओं ने इस पोस्ट में वर्णित बातों से अनभिज्ञता प्रकट की है. उनके लिए प्रस्तुत है यह सार संक्षेप

1. पाबला जी के ब्लॉग पर अपने जन्मदिन की घोषणा करनेवाली दो माह पुरानी पोस्ट को हटाने के लिए रचना जी ने अनुरोध किया.

2. आदतन, रचनाजी ने अंग्रेजी में कमेंट किए, जिन्हें पाबला जी ने यह कहकर डिलीट कर दिया कि "अंग्रेजी या रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे".

3. इस प्रकरण पर दो-तीन दिन तक खींचातानी चलती रही. नतीजा कुछ न निकला.

4. डॉ. कविता वाक्चनवी जी ने चिट्ठाचर्चा ब्लॉग पर इस प्रकरण पर बेहतरीन पोस्ट लिखी.

5. चूंकि पाबलाजी ने यह लिखा था कि "रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे (अर्थात हिंदी ब्लॉग में केवल हिंदी के कमेंट ही चलना चाहिए)", संभवतः इस बिंदु पर कुश ने चिट्ठाचर्चा ब्लॉग में अपने कमेंट में लिखा "यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो उन ब्लोग्स को तुंरत डिलीट किया जाते जिन पर भोजपुरी, हरयाणवी या और किसी क्षेत्रीय भाषा में कुछ लिखा जाता हो क्योंकि हमें बढा तो हिंदी को देना है". (संभवतः इसलिए क्योंकि कुश ही हैं जो बेहतर बता सकते हैं कि उनका कमेन्ट किस सन्दर्भ में था).

6. ध्यान दें, पाबला जी ने यह नहीं कहा कि वे हिंदी को अलावा किसी अन्य भारतीय भाषा या बोली में कमेंट स्वीकार नहीं करेंगे. उनहोंने केवल यह कहा कि "अंग्रेजी या रोमन लिपि में किये गए कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे".

7. ध्यान दें, कुश ने भी यह नहीं कहा कि भोजपुरी, हरयाणवी या अन्य किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखे ब्लॉगों को डिलीट कर देना चाहिए. तो फिर कुश का कमेंट क्या कह रहा है? अब यह समझना इतना कठिन तो नहीं है कि मैं यहां भाषाशास्त्र खोलकर बैठ जाऊं.

8. कुश की टिप्पणी को उठाकर एक-दो ब्लॉगों पर छीछालेदर की गई. कई अनुभवी ब्लॉगरों ने वहां अपनी टिप्पणियां दीं जिनमें इस छीछालेदर का समर्थन किया गया.

9. यह सब मुझे नागवार गुज़रा, परिणाम यह पोस्ट.

2012 में दुनिया ख़त्म!?

वैसे, दुनिया को बने कितने साल हो गए हैं? बिग बैंग और कॉस्मिक रेडिएशन को प्रमाण मानें तो हमारा कॉसमॉस लगभग 13 .7 अरब साल पहले अस्तित्व में आया. सूर्य और सौरमंडल की उत्पत्ति लगभग ५०० करोड़ साल पहले हुई और एक अनुमान के मुताबिक सूर्य को अभी नष्ट होने में भी इतना ही समय लगेगा, हांलाकि उससे बहुत पहले ही पृथ्वी पर जीवन का सम्पूर्ण विनाश हो चुका होगा (सूर्य में होने वाले या अन्य अन्तरिक्षीय या भौगोलिक कारणों से).

कहीं पढ़ा था कि पृथ्वी की आयु को यदि 24 घंटा मान लें तो मनुष्य को आये हुए अभी एक सैकंड भी नहीं हुआ है. बस एक सैकंड!? और तीन साल बाद सब ख़त्म होने जा रहा है? हे राम!

और माया सभ्यता वालों ने इसको सैकड़ों सालों पहले पता भी लगा लिया और लिख भी गए. ये बात और है कि वे स्वयं को ही नहीं बचा पाए और स्पेनी हमलावरों ने उनकी अच्छे से वाट लगा दी.

भारत में इतने बड़े-बड़े विद्वान्, त्रिकालदर्शी और ज्योतिषी हुए लेकिन किसी को भी इसका कोई अंदेशा नहीं हुआ! ऐसा कैसे हो सकता है? हमारा सारा विप्रवर्ग क्या अब तक घास छीलता रहा है? लानत है ऐसी सभ्यता और संस्कृति पर!

ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब सन 2000 की शुरुआत में भी कुछ मूढ़मगजों ने टेम्पल टटल धूमकेतु की आमद को विनाश से जोड़कर देखा और अमेरिका में 110 लोगों ने एक साथ आत्महत्या कर ली. हमें तो उसी समय लगने लगा था कि ये घटनाएँ किसी बड़ी आपदा का संकेत हैं.

चार साल में कुल जमा आठ-दस बार 2012 में दुनिया ख़त्म होने की बात सुनकर तो मेरी हालत वाकई पतली होने लगी है. पत्रकारिता जगत के इतने बड़े विद्वान् जब पूरे हवाले से इस खबर को फ्लैश करते हैं तो इसपर शक करने की कोई गुंजाईश ही नहीं. वैसे हाइड्रोन कोलाइडर को लेकर भी कुछ महीनों पहले ऐसी ही खबर चली थी. उसे इंडिया टीवी पर बार-बार देखकर मध्य प्रदेश में एक किशोरी इतनी भयभीत हो गई की उसने आत्महत्या कर ली.

मैं तो मानता हूँ भाई. बार-बार तो हमारे इतने जागरूक और सजग पत्रकार भाई झूठ नहीं बोलेंगे. कुछ तो है इस खबर में. मुझे तो विश्वास है की दुनिया ख़त्म हो जायेगी.

तो मैंने तब तक बच रहा समय आनंद से व्यतीत करने के लिए एक योजना बनानी शुरू कर दी है. नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद मैं GPF के पैसों से कार खरीदने वाला हूँ. बच्चों को अब स्कूल में भर्ती नहीं कराऊँगा. जीवन बीमा पॉलिसियों को कैंसल करवाना है. पिताजी को पटाकर जमीन बिकवानी है ताकि 2012 तक हम शहर-शहर मजे से घुमते हुए अपना समय काट लें.

दुनिया के ख़त्म होने के नज़ारे को कैमरे में कैद करना बेवकूफ़ी होगी इसलिए हम तो ऐसा कुछ नहीं करेंगे. किसी ने कुछ दिनों पहले किसी ब्लौग पर लिखा की करोड़ों लोग यदि एक साथ गायत्री मंत्र का पाठ करें तो इस प्रकार की मुसीबतें टल जाएँगी. लेकिन मुझे इसमें शक है.

पोस्ट तो लंबी होती जा रही है. खैर, अब आप मुझे बताएं की दुनिया वाकई में 2012 में ख़त्म होनेवाली हो तो आपकी ज़िन्दगी में क्या-क्या बदल जायेगा. आप क्या करना चाहेंगे और बचा हुआ वक़्त कैसे बिताना चाहेंगे?
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